Shayari
मिरा इजहार- ए-महोब्बत सरेआम हो गया
जिसकी गली का भी मालूम भी न था
उसी के मकान में हररोज आना जाना हमारा काम हो गया
ओ इसां गर तू सोचता है के तेरे पास कीमतीं सामान नहीं, तो गौर से सुन,तेरी आखोँ के पीछे गहरे समन्दर में इक मणि है,तेरे जिस्म के मध्य तह में इक सापँ,गर तू इस साँप को मणि से मिला दे,तो तमाम दुनिया की दौलतों से भी कीमतीं या फिर यूं कहे कि अनमोल सामान का तू मालिक हो जाएगा,जा हासिल कर
ना पूछ मिरां मिजाज तब तक
जब तक मिरीं रूह वज्द में ना आए,
सुन यार मिरीं फकत ये मुश्किल है
तमाम हसरतों की चाह मिरीं रुह को कैद करती गयी,
फिर बस इक चाह मिरीं इन हसरतों को तमाम करने की रिहा कर गई
खुदा आसमां से जमीं पर देखता नहीं,
ये राज जानते ही हम अपनी आखोँ के रास्ते से
अक्सर आसमां को देखा करते है
जिस्म तब तक जब तक इसमें रूह समाई है,
रूह तब तक जब तक इसमें सासों की आवा जाई है,
सासें कब तक ये तू नहीं जान पायेगा,
पर जे गौर करेगा जो तू खुद की सासों पर तो अपने जिस्म और रूह दोनों पे कब्जा पाएगा
इतना कर और सासों की माला पिरोह फिर तू जानेगा तू बस परवरदिगार के दर सुकुन पाएगा,
ना किसी मौलवी के,ना किसी पडिंत के,ना किसी गुरू के बताए को तू गयान मान,
अपने अन्दर जा, जहाँ तक तू पहुंचे उसी को सच मान
खुद में खुद को पहचान ,
सुन जरा गौर से तेरे अन्दर की आवाज जिससे तू है अन्जान,
मिल उस यार से तब सच से सच को जान
अजांमें महोब्बत मौत की दुआं मागंने के सिवा कुछ नहीं,
गर महोब्बत दुनिया में किसी शक्स से हो तो आशिक मर मर के जीता है,
गर परवरदिगार के अक्स से हो तो आशिक जीते जी मरता है
उस कैद में क्यूं रहे जहाँ रिहाई ना हो,
वो रात सुकुन वाली नहीं जिसमें तनहाई ना हो,
तेरे यार से तू है जुदा, कर फकर,
नही तो इश्क सच्चा नही जिसमें जुदाई ना हो
परवरदिगार के दर पहुंच तशरीफ भी ठीक से नहीं रखते के हम जलील कर बाहर निकाल दिए जाते है।
हम जानते वो हमारा खुद का घर है, बेहयायी से मगरुर बन बार बार चले आते है।
ना मन्दिर,ना मस्जिद, ना किसी तीरथ मे रहे खुदा,
तेरे जहन में बसा पर तू उससे है जुदा,
बैठ तनहाई में रोज खुद के साथ
तेरी रूह बिरहा में तपते ही देगा परवरदिगार हाथ
रूहानियत का इल्म देने वाला गुरू आसानी से किसी भी शक्स को हासि़ल हो जाता है क्यूकिं लाखों है जो बताये,
पर जिस गुरू को रूहानियत हासिल हो, ऐसा गुरू कोई विरला आए और वो तब तक ना मिले जब तक हमारे रूह,जिस्मो-जान में बिरहा ना समाए
ऐसे गुरू को क्यूं ना बल बल जाए,
कहे फनकार कोई आन मिलाए
मै सुना कही किसी गली में छुपा इक मेहमान अजब है,
जा के जाना वहाँ की तो हर शाम गजब है
मेरी आखँ क्यू नम है ये कहानी फिर सही,
ए हाले दिल पूछने वाले तू आज बता क्या तुझे कोई गम है
हर किसी को है कोई तलब,मेरी है इक तालाश
तमाम महफिले,शोहरतें,दौलतें हासिल हो बेशक
रूहानियत हासिल नहीं जब तलक हम सब जीते जी है बस इक लाश
सासों में कुछ लम्हें स्वर थम तो जाते है,
पर साज तब छिडे जब मन में राम रम जाते हैं
जो उमर कल तक कटती ना थी,
तेरे मिलने के बाद लगता है के हमारी उमर थोडी सी थोडी है
लोग तनहाई का बेवजाह गिला करते है, फन्कार तनहाई में रुह से मिला करते है,
मैं कि जाना पाठ,
मैं कि जाना पूजा,
मैं कि मन्ना शरे दा आखा,
रब मिलन लई इक हरफ बतेरा,
मैं फरूख मैं नाम रस चाखा
शरा ः Religious counselor
हरफ ः one word,recitation of any word in lord recalling,Jaap
फरूख ः who attain quality of discriminate between truth and false
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